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Poem
सपनों की कीमत

सपनों की कीमत

समंदर है सपनों का

लहरों में इक इक ख़्वाब समाए हैं

किसीने शोहरत किसीने दौलत

तो किसीने इज़्ज़त कमाए हैं

कश्ती अपनी मज़बूत बना लो

कि आंधी तूफ़ां भी न तोड़ सके

हौसला दमदार रखना कि टूटे जो कश्ती भी तो

उसे फ़िर से जोड़ सके

यहाँ बिकते हैं कुछ सपने

अपने ईमान के बदले

कि क़ाबिलियत सामने आती है

मगर जान के बदले

हर मोड़ पे अँधेरा है

न किसी का पेहरा है

आख़िर क्यों अपने सपने तोड़ गए?

ये राज़ भी कितना गहरा है…

तुम तो कमज़ोर नहीं थे

ये अब सब कहेंगे

मुस्कुराए नहीं  जो कभी देखकर तुम्हें

अब मगरमच्छ के आँसूं रोएँगे

इस चाँदनी में तुम चाँद बनने निकले थे

आज चाँद के करीब क्यों चले गए?

जिन दिलों को गुमान था तुम्हारी कामयाबी पे

उनको करके ग़रीब क्यों चले गए?

तुम सितारा बनकर उभरे थे

सितारों में छुपना क्यों चाहा?

चुपी में न जाने कितने दर्द सह लिए

किसीसे कुछ क्यों नहीं कहा?

आज जा चुके हो बड़ी दूर तुम

पर हर दिल में समाए हो

देख लो झाँक कर जन्नत की खिड़कियों से

अपनी कलाकारी से क्या कमाए हो…

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