• 7008662409
  • theabhilasha14@gmail.com
Story
भूख

भूख

       कुछ दिनों के अंदर ही चारो ओर ऐसा परिवर्तन का सिलसिला शुरू हो जाएगा जो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।”कोरोना” चाइना से आकर सीधे ओडिशा में पहुंच जाएगा यह भावना सम्पूर्ण रूप से अप्रत्याशित था। लेकिन वो तो पहुँच चुका था उस वक्त में सामाजिक दूरी बनाए रखने के अलावा कोई दूसरा तरीका नहीं था। सामाजिक दूरी ही एक मात्र ब्रह्मास्त्र था इस महामारी से लड़ने के लिए इस महामारी का सामना केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही मिलकर तत्परता से कर रहे थे। पुलिस, डाक्टर , सफाई वालो ने अपने जिन्दगी की बाजी मे लगा दी। कोरोना युद्ध में और कामयाब भी हुए। कॉरोना तो नियंत्रित हो रहा था लेकिन गरीबी दिन – व – दिन बढ़ती जा रही थी। लोग अपने कर्म संस्थान हरा रहे थे , चोरी डकैती दिन – व – दिन बढ़ने लगी थी। एक दिन की बात है करीबन सुबह दस घड़ी में बजे हुए थे, रामलाल के घर के सामने एक दुबला – पतला काला आदमी घूमता हुआ सुजाता ने देखा। ऐसा लग रहा था जैसे वो व्यक्ति किसी से मिलना चाहता था। सुजाता के मन में एक बात खटकी , ये व्यक्ति कौन है ? इसे तो यहां कभी नहीं देखा ?  सुजाता दौड़ती हुई घरके अंदर चली आयी और सब बातें रामलाल को और माँ को कह दी। बेटी की बात सुन कर दोनों ने बाहर आकर देखा तो बात सच निकली एक व्यक्ति गेट के बाहर खड़ा था ,उसका वेशभूषा पागलों के जैसे थी, ऐसा लग रहा मानो जैसे बहत दिनों से भूखा हो। रामलाल ने पूछा -“तुम कौन हो ? तुम्हे तो यहाँ कभी नहीं देखा?  क्या चाहते हो ? बोलो शायद वह आदमी अंदर आना चाहता था लेकिन रामलाल ने बातों के बीच उसे घर में आने ही नहीं दिया। बाहर खड़े होकर ही वह आदमी बोलने लगा – “जी मैं कोई चोर या पागल नहीं हूँ, मैं तो बस एक लाचार हूँ और दो दिनों से भूखा हूँ, घर में एक चार साल की बेटी है वह भी भूखी है। मेरे पास पैसे नहीं हैं, मैं जहाँ पर काम करता था नुकसान के कारण वहाँ काम बंद हो गया, इस हालत में कोई मुझे नौकरी नहीं दे रहा है। आपकी मेहरबानी होगी अगर आप मुझे कुछ काम दे दें, तो  काम के बदले पैसे ना सही कुछ खाना दे दीजिए। उसकी यह बात सुनकर एक दुख मिश्रित निरबता की छाया चारो और फैल गया। रामलाल ने कहा -“अभी तो हमारे पास  भी कुछ काम नहीं तुम्हारे लिए लेकिन तुम्हें कुछ खाना जरूर दे सकता हूँ। घर के अंदर जाकर रामलाल की पत्नी ने कुछ रोटी और सब्जी लाकर उसके हाथ में रख दी। लेकिन न चाहते हुए भी परिस्थितिवश उसने वह खाना ले लिया। खाना लेने के बाद वह आदमी ने रामलाल की पत्नी और रामलाल को बोला – आप मेरे लिए भगवान के जैसे हो, सुबह से लेकर अब तक सबके घर जा जा कर अपनी मजबूरी का जिक्र किया लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। आप लोगों का शुक्रिया अदा करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है, लेकिन मैं वादा करता हूँ जल्द ही आपका अहसान चुका दूँगा। अभी मुझे विदाई दीजिए मेरी बेटी मेरा इंतजार कर रही होगी। इतना कहकर वो आदमी अपने घर चला आया जहाँ उसकी बेटी उसका इंतज़ार कर रही थी। रामलाल की पत्नी ने अपनी बेटी को कहा -“देखा सुजाता अब भी दुनिया में रोटी के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है, यही भूख के कारण दुनिया में चोरी डकैती बढ़ती जा रही है, लोग अब भी एक वक्त खाने को नहीं पा रहे है,लेकिन हम है कि खाना अगर अधिक हो तो उसे फेंक देते हैं। क्या हम ये ठीक करते हैं ? जरा अपने विवेक से एक बार विचार करो तो? यह सुन के सुजाता ने कहा पापा आप सही बोले। आज अगर मैं ये घटना अपने आंखो से ना देखती और ना सुनती तो शायद मैं कभी समझ नहीं पाती खाने की ज़रूरत। आज से मैं कभी भी खाना नहीं फेकूंगी। सब खुशी से अंदर चले गए।

1 thought on “भूख

Leave a Reply