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Poem
प्रकृति का प्रतिशोध

प्रकृति का प्रतिशोध

मौली मेहता

हाथ में कुल्हाड़ी देख बोल पड़ा एक वृद्ध पेड़
कहा हे मानव ! प्रकृति के सौंदर्य को मत छेड़,
जिसने सेखा अपना सर इस कड़ी धुप में
ताकि मिल सके तुझे छाया हर रूप में l

कल जिस उत्साह के साथ तूने बीज बोया
आज उसी उत्साह के साथ पेड़ को काटा,
देखते ही देखते कितना खुदगर्ज हो गया है यह मानव
जो आज बन गया है इस प्रकृति के लिए दानव l

दर्द, कष्ट सहकर भी जिसने दी लकड़ी घर सजाने को
आज उसी इन्सान ने अक्षुत कर दिया उसके दर्द को,
बड़ी शिद्दत से जब बरसा प्रकृति का कहर
तब इन्सान को याद आया अपना ही फैलाया हुआ ज़हर l

बहुत कहा था कर दे प्रकृति पर थोड़ा मेहर
हे मानव ! उस पे अत्याचार करने से पहले ठहर,
कुछ मानव उद्धारकर्ता के रूप में प्रतिज्ञा लिए हुए थे
तो कुछ अपने अर्जनशीलता के व्यवहार से ग्रस्त थे।

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